Best explanation of Human Excretory System

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उत्सर्जन तंत्र- Excretory System

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शरीर से जहरीले पदार्थों को बाहर निकालने की क्रिया को उत्सर्जन (Excretion) कहते हैं।मनुष्य के उत्सर्जन तंत्र(Excretory System) में निम्नलिखित अंग आते हैं- 1. आंत (Intestine) 2. फेफड़ा (Lungs), 3. त्वचा (Skin) 4. यकृत (Liver) एवं 5. वृक्क (Kidney)

फेफड़े (Lungs): फेफड़े श्वसन के साथ-साथ Excretory System का भी भाग हैं। फेफड़ो का मुख्य  कार्य रक्त से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाना है। कुछ पदार्थ जैसे- लहसुन, प्याज और कुछ मसाले जिनमें कुछ वाष्पशील घटक पाये जाते हैं, का उत्सर्जन फेफड़ों के द्वारा होता है।

त्वचा (skin): त्वचा भी  Excretory System  का भाग है। त्वचा में उपस्थित तैलीय ग्रन्थियाँ और पसीने की ग्रन्थियाँ क्रमशः सीबम एवं पसीने का स्राव करती हैं। सीबम एवं पसीने के साथ अनेक उत्सर्जी पदार्थ शरीर से बाहर निष्कासित हो जाते हैं।

यकृत (Liver): यकृत कोशिकाएँ आवश्यकता से अधिक ऐमीनो अम्ल तथा रुधिर की अमोनिया को यूरिया में परिवर्तित करके उत्सर्जन में मुख्य भूमिका निभाता है। इसके अतिरिक्त यकृत तथा प्लीहा कोशिकाएँ टूटी-फूटी रुधिर कोशिकाओं को विखंडित कर उन्हें रक्त प्रवाह से अलग करती हैं। यकृत कोशिकाएँ हीमोग्लोबिन का भी विखण्डन कर उन्हें रक्त प्रवाह से अलग करती है।

आंत (Intestine): आंत की दीवार में रुधिर कोशिकाओं का जाल होता है। इन कोशिकाओं के रुधिर में विद्यमान वर्ज्य पदार्थ की कुछ मात्रा आँत की कोशिकाएँ विसरण क्रिया द्वारा अवशोषित करके आँत की गुहा में पहुँचा देती है। यहाँ से वे मल के साथ बाहर निकल जाते हैं। इस प्रकार ऑत अनपचे भोजन को शरीर से बाहर निकालकर उत्सर्जन में मदद करती है।

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वृक्क (Kidney)-Main part of excretory system

वृक्क Excretory system का सबसे महत्वपूर्ण भाग है, मनुष्य में मुख्य रूप से एक जोड़ा वृक्क (Kidneys) होता है जिसका कार्य रुधिर से अपशिष्ट पदार्थो को हटाना है। वृक्क द्वारा रक्त का फ़िल्टर होना अपोहन (Dialysis) कहलाता है। वृक्क सेम के बीज के आकार के होते हैं। इसके चारों तरफ पेरिटोनियम (Peritoneum) नामक एक झिल्ली पायी जाती है। वयस्क मनुष्य में प्रत्येक वृक्क 4 से 5 इंच लम्बा, 2 इंच चौड़ा और लगभग 1.5 इंच मोटा होता है। इसका भार लगभग 140 ग्राम होता है।

वृक्क का बाह्य भाग कॉर्टेक्स (Cortex) कहलाता है जबकि भीतरी मोटा दो तिहाई भाग मेडुला (Medulla) कहलाता है। मेडुला शंकुरूपी (Cone shaped) रचनाओं से भरा होता है जिन्हें पिरामिड (Pyramid) कहते हैं। सभी पिरामिडे एक थैलीनुमा गुहा में दिष्ट (Directed) रहती है। इस गुहा को वृक्क पेल्विस (Renal pelvis) कहते हैं।

वृक्क पेल्विस से एक लम्बी तथा संकरी वाहिनी निकलती है जिसे मूत्रवाहिनी (Ureter) कहते हैं। दोनों ओर की मूत्रवाहिनियाँ मूत्राशय (Urinary bladder) में खुलती हैं। प्रत्येक वृक्क से लगभग 13,00,000 सूक्ष्म नलिकाएँ (Micro tubules) होती है जिन्हें वृक्कक या नेफ्रॉन (Nephron) कहते हैं। नेफ्रॉन वृक्क की कार्यात्मक इकाई (Functional Unit of Kidney) होती है

संरचना : प्रत्येक वृक्काणु में एक कपनुमा संरचना होती है, जिसे बोमन संपुट कहते हैं। यह रुधिर कोशिकाओं की जाल को घेरे रहती है। इसे कोशिकागुच्छ कहते हैं। इस बोमन संपुट से एक नलिका कार संरचना निकलती है, जो कुंडलित नलिका कहलाती है। यह नलिका फिर एक संरचना बनाती है जिसे हेनले लूप कहते हैं इसके द्वारा बनाई गई कुंडलित संरचना को डीसीटी (DCT) कहते हैं जो वाहिनी में जाकर मिलती है।

nephron structure

क्रिया-विधि : रुधिर को वृक्क धमनी द्वारा बोमन संपुट के कोशिकागुच्छ में लाया जाता है जहां उसे छाना जाता है। कोशिकागुच्छ से रक्त का फ़िल्टर होना परानिस्पंदन कहलाता है।

प्रारंभिक निस्पंदन में ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, प्रचुर मात्रा में जल रह जाता है। प्रक्रियानुसार जैसे-जैसे निस्पंदन, हेनले लूप और कुंडलिक नलिका से गुजरता है उपयोगी पदार्थों को दोबारा अवशोषित कर लिया जाता है तथा यूरिया, पानी तथा दूसरे व्यर्थ पदार्थ मूत्राशय में एकत्रित कर लिए जाते हैं।

वृक्क में रुधिर की आपूर्ति (Supply of blood in the kidneys): महाधमनी (Aorta) से वृक्क धमनी (Renal artery) रुधिर को वृक्कों के भीतर ले जाती है। प्रत्येक वृक्क में वृक्क धमनी प्रवेश करने के बाद अनेक पतली शाखाओं में विभाजित हो जाती है जिन्हें वृक्क धमनिकाएँ (Arterioles) कहते हैं। ये वृक्क धमनिकाएँ प्रत्येक नेफ्रॉन के बोमेन सम्पुट में प्रवेश करती हैं जिसे अभिवाही धमनिका (Afferent arteriole) कहते हैं। अभिवाही धमनिका बारबार विभाजित होकर महीन केशिकाओं (Capillaries) का एक गुच्छा बनाती है, जिसे केशिका गुच्छ (Glomerulus) कहते हैं। केशिकाएँ केशिका गुच्छ के बाद पुनः संयोजित होकर अपवाही धमनिका (Efferent arteriole) बनाती है। अपवाही धमनिका खून को वापिस वृक्क शिरा तक ले आती है । वृक्क शिरा वृक्क से रुधिर को इकट्ठा कर हृदय (Heart) में पुनः वापस ले जाती है। 

पुनरावशोषण (Reabsorption): बोमेन सम्पुट में छनने के बाद रुधिर नेफ्रॉन के बाहर मौजूद केशिकाओं के जाल से होकर प्रवाहित होता है। नेफ्रॉन की विभिन्न नलिकाओं से गुजरते समय निस्यंद में उपस्थित अनेक लाभदायक तत्त्वों को नलिकाओं के चारों ओर मौजूद रुधिर केशिकाओं द्वारा पुनः सोखकर रुधिर परिसंचरण में लौटा दिया जाता है। इस क्रिया को पुनरावशोषण (Reabsorption) कहते हैं। निस्यंद से अधिकांश जल का अवशोषण परासरण (Osmosis) द्वारा होता है। अन्य अवशोषित होने वाले लाभदायक तत्त्व ग्लूकोस, विटामिन, हार्मोन, खनिज-लवण इत्यादि होते हैं। हाल की खोजों से पता चला है कि 100 ml निस्यंद से लगभग 99 ml द्रव का पुनरावशोषण हो जाता है। पुनरावशोषण के पश्चात् कभी-कभी नलिका की कोशिकाओं से कुछ उत्सर्जी पदार्थ स्रावित होते हैं जो निस्यंद में मिल जाते हैं। इसे ट्यूबुलर स्रवण (Tubular secretion) कहते हैं। इस निस्यंद (Filtrate) को मूत्र (Urine) कहते हैं।

मूत्र की संरचना एवं प्रकृति (Nature and composition of urine): नेफ्रॉन या वृक्क नलिका में रुधिर से छनकर आए जल एवं शेष उत्सर्जी पदार्थों के मिश्रण को मूत्र कहते हैं। मनुष्य का मूत्र पारदर्शी एवं हल्के पीले रंग का द्रव होता है। मूत्र का पीला रंग हीमोग्लोबिन के अपघटन से निर्मित यूरोक्रोम (Urochrome) नामक वर्णक (Pigment) के कारण होता है। मूत्र के गंध का कारण इसमें उपस्थित कार्बनिक पदार्थ होता है। एक सामान्य व्यक्ति में 24 घंटे में लगभग 1.5 लीटर मूत्र बनता है। सामान्यतया ताजा मूत्र अम्लीय प्रकृति का होता है। एक सामान्य व्यक्ति के मूत्र में जल (96%), यूरिया (2%), प्रोटीन, वसा, शर्करा एवं दूसरे कोलयड्स (1.3%), यूरिक अम्ल (0.5%) के साथ अत्यल्प मात्रा मे क्रियेटिनिन, सोडियम, पोटैशियम, कैल्सियम, मैग्नीशियम, क्लोरीन, सल्फेट, फॉस्फेट, सीसा, अमोनिया, आर्सेनिक, आयोडीन, नाइट्रोजन आदि पाए जाते हैं।

Complete nervous System-तन्त्रिका तन्त्र

वृक्क के कार्य (Function of kidneys): वृक्क के निम्नलिखित महत्वपूर्ण कार्य हैं-

  • रक्त को छानकर मूत्र निमाण करना।
  • शरीर में जल की मात्रा को सन्तुलित करना।
  • वृक्क शरीर में अम्ल क्षार सन्तुलन बनाने क कार्य करते हैं ।
  • रक्त में शर्करा का नियन्त्रण करना।
  • वृक्क रक्त में सोडियम एवं कैल्सियम आदि शरीरोपयोगी खनिज लवणों के स्तर को नियन्त्रित करने क कार्य करते हैं।
  • यह बाहरी पदार्थों जैसे दवाइयाँ, विष इत्यादि जिनका शरीर में कोई प्रयोजन नहीं होता है, का निष्कासन करता है।

Dialyser

अपोहन (डायलिसिस) रक्त फ़िल्टर करने की एक कृत्रिम विधि होती है। इस डायलिसिस की प्रक्रिया को तब अपनाया जाता है जब किसी व्यक्ति के वृक्क यानि गुर्दे सही से काम नहीं कर रहे होते हैं। गुर्दे से जुड़े रोगों, लंबे समय से मधुमेह के रोगी, उच्च रक्तचाप जैसी स्थितियों मेंकई बार डायलसिस की आवश्यकता पड़ती है। स्वस्थ व्यक्ति में गुर्दे द्वारा जल और खनिज (सोडियम, पोटेशियम क्लोराइड, फॉस्फोरस सल्फेट का सामंजस्य रखा जाता है।

Dializer

डायलसिस स्थायी और अस्थाई होती है। यदि रोगी के गुर्दे बदल कर नये गुर्दे लगाने हों, तो जब तक गुर्दे नहीं बदले जाते तब तक मशीन(dialyser) की मदद से अपोहन की प्रक्रिया की जाती है।

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